गुलाम अली और उनके दुश्मन
( आलेख और प्रतिक्रिया : योगेश किसलय )
प्रभात खबर के प्रधान संपादक ने पहले ही दो कार्यक्रमों का उदाहरण देकर "पिन ड्रॉप साइलेंस "के लिए लोगो उकसाया था लेकिन बेतमीज , निगोड़े दर्शक- श्रोता रांची की गरिमा को तार तार करते रहे . सत्तर साल के इस लिविंग लिजेंड गुलाम अली को रांची के लोग फिर से शायद ही सुन और देख सके . लेकिन जिस तरह से कल दर्शको ने किया उससे रांची की अवाम का बौद्धिक स्तर रेखांकित होगा और मुझ सहित बहुत से लोग उस श्रेणी में खुद को आना गवारा नहीं करेंगे . शायद यह सोचकर हम संतुष्ट हो ले कि इस कार्यक्रम में कुर्सिया नहीं चली , छेड़छाड़ नहीं हुई , शोर शराबा नहीं हुआ लेकिन गजल पसंद और वह भी गुलाम अली के कार्यक्रम के लिए इतना काफी था ? टाई सूट लगाकर कई लोग सिर्फ इसलिए मौके पर पहुचे थे कि बहुत दिनों से किसी बड़े फंक्शन में उन्होंने अपनी "गरिमामयी " उपस्थिति दर्ज नहीं कराई थी . उन्हें कोई मतलब नहीं था कि गुलाम अली कौन है और उसकी गायकी क्या होती है . गुलाम अली ने बड़े अदब से कहा था कि सामने से गुजरने वालो से उनका ध्यान भंग होता है , लेकिन ऐसे जनाब थे जिन्हें लगता था चूल्हे में जाये गुलाम अली की गायकी , पहले वे अपने यार दोस्तों से हाय हल्लो कर ले फिर मोबाइल पर लोगो को जताते रहे कि वे गुलाम अली के कार्यक्रम में आये हुए हैं . पूरे कार्यक्रम के दौरान मुसलसल तरीके से मंच के नीचे भटकते रहे और लोगो को अपने अस्तित्व का अहसास कराते रहे . दूसरे तरह के वे लोग थे जिन्हें काजल पावडर में लिपि पुती अपनी सहचरियो का प्रदर्शन करना था . सहचरी भी निहायत भोली भाली . कुछ ने कहा गुलाम भाई अच्छी कविताये लिखते हैं . दूसरे ने टोका कविताये नहीं गजल ..तो पहली ने सफाई दी अरे उर्दू में कविता को ही गजल कहते हैं .लब्बो लुआब यह कि उन्हें गुलाम अली की गजल से अधिक अपनी जरीदार साड़ी की कीमत , हेयर स्टाइल की चर्चा और चेहरे में पपड़ी हो चुकी मेकप का वर्णन करने में इस भीड़ भरी सभा का उपयोग किया . तीसरे तरह के वे लोग थे जिन्हें भीड़ का हिस्सा होने का शौक है . वे
अपने परिवार और बच्चो के साथ आयोजनों में जाते हैं और आधा समय सीट लूटने में फिर परिवार और बच्चो को व्यवस्थित करने में और फिर बच्चो की फरमाइशे पूरी करने में बीत जाती है . कोई चाइनीज फ़ूड मंगवाकर भीड़ का मजा ले रहा है तो किसी ने ठोक के भाव चिप्स ,कुरकुरे, दालमोट मंगा लिए. उन्हें शायरी से अधिक दालमोट के स्वाद ही अच्छे लगते रहे .
हद तो तब हो गयी जब दो तीन गजलो के बाद ही लोग उठकर चलने लगे , इधर शेर गया जा रहा है उधर जनाब खड़े होकर उंघते हुए गुलाम अली साहब को टाटा बाय बाय करते निकल गए . भोले भले गुलाम अली तो पूरे मूड में थे . अपनी उम्र का हवाला देकर उन्होंने इंटर वल माँगा और फिर से देर तक गजल गाने का इरादा जाहिर किया लेकिन जिस तरह से लोग कुर्सिया छोड़कर निकल रहे थे मामले को भंफकर एक सहयोगी ने कहा एक दो शेर और सुनाकर विदा ही ले लेना बेहतर होगा . कसक उठती है कि मै भी उस भीड़ का हिस्सा क्यों था . मैंने ऐसे लोगो को इसलिए गुलाम अली का दुश्मन कहा है क्योंकि किसी भी कलाकार का अगर सबसे बड़ा दुश्मन होता है तो वह जो उसकी कला की कद्र न करे और पूरे कार्यक्रम के दौरान वे मेरे भी दुश्मन बने रहे क्योंकि मैं दोनों ओर देख रहा था गुलाम अली को भी और ऐसे विघ्न संतोषियो की ओर भी .
बोकारो में लगभग बीस साल पहले गुलाम अली आये थे . मेरे एक संवाद दाता ने मुझे बाद में खबर की .तब भी मैंने उसे जमकर खरी खोटी सुनाई थी . इसलिए कि उसे लगा कि गुलाम अली ऐसी वैसी ही हस्ती होगी . लेकिन रांची के लोग भी गुलाम अली की गरिमा को नहीं समझे तो मुझे ग्लानी हो रही है कि मैंने उस संवाद दाता को उस समय क्यों खरी खोटी कहा था .
प्रभात खबर के भाइयो और ऐसे ही कार्यक्रम के अयोजन के इक्षुक दोस्तों , शोर नहीं बरपा तो संतुष्ट न होइए , रेवड़ी की तरह पास न बाँटिये , जो गंभीर न हो उन्हें बाहर से खदेड़ दीजिये , ...आप गाली सुन लेंगे लेकिन शहर बदनाम होने से बच जायेगा . वैसे निजी तौर पर कहू तो गुलाम अली को सुनना तो दूर देखना ही मेरा सपना था . आपने तो सुना भी दिया . यह अहसान बकाया रहा ..धन्यवाद !!!!!
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